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बच्चों को न बनने दें नखराले पिकी ईटर

क्या आपके बच्चे के पसंदीदा मेन्यू में घर की सब्जियों/डिशेज के बस चुनिंदा नाम हैं? क्या नखराले बच्चों के पोषण को लेकर आप चिंतित रहती है? अलग अलग वैरायटी, रंग बिरंगे खाने, बढिय़ा गार्निशिंग सब कोशिश कर ली, पर बच्चे चखने को तैयार हों तब न बात आगे बढ़े। समाधान कई हैं। कुछ बहुत मूलभूत और सरल बातों की जानकारी आपके बच्चे के स्वास्थ्य और पोषण की नींव मजबूत कर सकती है-

उनके टेस्ट बड्स ज्यादा हैं
स्वाद कलिकाएं या टेस्ट बड्स उम्र के साथ कम होते जाते हैं। हमें जो गन्ध या स्वाद अच्छा लगे हो सकता है बच्चे को वह परेशान कर रहा हो। ‘मीठा भला है कड़वा-तीखा बुरा’ शुरुआत में बच्चों का टेस्ट सेन्स इसी नियम का अनुसरण करता है। यह प्रकृति प्रदत्त होता है। चूंकि मां का दूध मीठा होता है, दूषित, विषैली चीजों का स्वाद कड़वा कसैला, तो बच्चा मीठे स्वाद के प्रति आकर्षित होता है। दूसरे स्वाद नहीं भाते।

ना, हर बार की ना नहीं
जो सब्जियां या स्वाद बच्चे को एक बार पसंद नहीं आए, जरूरी नहीं कभी पसंद नहीं आएगा बशर्ते आपने कोशिश करना न छोड़ा हो। जब भी बच्चा कुछ नापसंद करे, थोड़े परिवर्तन के बाद उसे दुबारा दें, बार बार दें, कुछ समय बाद शरीर उसे स्वीकार कर लेगा।

खाना न मिलना सजा है
खाने की थाली को बच्चे दण्ड के तौर पर न देखें इसका खयाल रखें। भूख न होने पर जबरदस्ती कभी न खिलाएं। उल्टी, अपच, पेटदर्द, भूख न लगना, अरुचि, एनोरेक्सिया, वजन घटना या ज्यादा बढऩा आदि जबरदस्ती खिलाने के परिणाम हैं। भूख का एहसास होने पर ही खाना दें। खाने से पहले या खाने के विकल्प के तौर पर जूस, फ्रूट्स, दूध आदि न दें। इनसे भूख मर जाती है।

बच्चे खुद कमाने नहीं जाते
बच्चों को बाहर के खाने के पैसे घरवालों से ही मिलते हैं जो उनकी ईटिंग हैबिट्स बिगाडऩे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बच्चों को घर के खाने पर कुछ पॉइंट्स दीजिए। हरी पत्तेदार सब्जियों पर सबसे ज्यादा पॉइंट रखिए। इन पॉइंट्स के बदले बच्चा हफ्ते में एक बार उसका पसंदीदा फास्ट फूड खा सकता है, रोज रोज नहीं।

प्रोत्साहन दीजिए लालच नहीं
खिलाने के लिए टीवी, कार्टून्स, गेम, आइसक्रीम, घुमाने फिराने आदि का लालच न दें। बल्कि जो बच्चा अच्छे से खाता है उसकी तारीफ करें, जो नहीं खाता, उससे एक बार पूछकर उसके मना करने पर थाली हटा दें। उसके सामने बैठकर खाएं पर उससे न पूछें न ही उसके लिए कुछ अलग से बनाएं ,वह बाहर या कहीं और कुछ खा ना आए इसका भी ध्यान रखें।

अपना मास्टरशेफ बनने दें
अगर थोड़े बड़े बच्चे हैं तो उनसे पूछकर खाना बनाइए, बनाते समय उनकी मदद लीजिए, अलग अलग प्रयोग उन्हें करने की आजादी दें। जगह हो तो छोटा सा किचन गार्डन बना लें। बच्चे जो ख़ुद उगातेे हैं, अमूमन उन्हें खुशी-खुशी खाते हैं।

उम्र महत्वपूर्ण है
यदि आपका बच्चा 6-24 माह के आयु वर्ग में है तो यकीन मानिए ये खाने की पसन्द तय करने का स्वर्णिम काल है। इसे मत चूकिए। इस समय जितना हो सके उतने नए नए स्वादों से बच्चे का परिचय कराएं। इस समय जितना ज्यादा अलग अलग स्वादों के सम्पर्क में आएगा बच्चा, उतने नखरे कम होंगे आगे चलकर।

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