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नजरअंदाज ना करें बच्चों के खर्राटे

नजरअंदाज ना करें बच्चों के खर्राटे

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क्या आपका बच्चा किसी भी बात को सीखने या नई चीज को पहचानने में देर लगाता है या एकाग्रचित अथवा शांत न रहकर इधर-उधर ध्यान ज्यादा भटकाता है? सुबह-सुबह सिरदर्द या थकान की शिकायत करता है? उसे ठीक से नींद नहीं आती या फिर खाना निगलने में दिक्कत महसूस करता है। अगर ऐसी समस्याएं आपके बच्चे में नजर आ रही हों, तो सतर्क हो जाएं। ये लक्षण बच्चों में ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एप्नीया या ओएसए के हो सकते हैं। स्लीप एप्नीया बच्चों में खर्राटों की एक वजह है जिसमें गले या सांस की नली में रुकावट आने से फेफड़ों तक ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती। इसके अलावा भी कई कारण हैं जिनकी वजह से बच्चे खर्राटे लेते हैं। 2-8 साल के बच्चों में समस्या ज्यादाकोलकाता के बेलव्यू अस्पताल के ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. उत्तम अग्रवाल के अनुसार दो से आठ साल की उम्र के लगभग 10 फीसदी बच्चे खर्राटे लेते हैं, इनमें से करीब 3-4 फीसदी स्लीप एप्नीया के शिकार होते
जब भी तेज भूख लगे ‘कुछ भी’ खाने से बचें

जब भी तेज भूख लगे ‘कुछ भी’ खाने से बचें

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आपने गौर किया होगा कभी-कभी तेज भूख लगने पर कुछ भी खाने का मन करता है लेकिन ऐसे में कुछ भी खाना कई बार मोटापे, बदहजमी, अपच जैसे रोगों का कारण बनता है। इसलिए जब भी भूख लगे तो कुछ ऐसा आहार खाएं कि यह एहसास थोड़ी देर के लिए थम जाए और कोई नुकसान भी न हो।   भूख का एहसास मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस नामक हिस्से में तब शुरू होता है जब यह विशेष प्रकार के हार्माेन छोड़ता है। भूख का एक आवेग करीब 30 सेकंड तक रहता है और यह लगातार 30-45 मिनटों तक होता रहता है। इसके बाद भूख 30-150 मिनटों तक कम हो जाती है। भूख की तीव्रता जितनी अधिक होगी, पाचन-क्रिया भी उतनी ही मजबूत होगी। पाचन-क्रिया ठीक होगी तो रक्त भी सही मात्रा में बनेगा। यह संतुलन बना रहे इसके लिए पाचन क्षमता को मजबूत बनाने का प्रयास करना चाहिए। पानी में कटौती न करें पानी शरीर को अंदर से साफ कर अधिक खाने से रोकता है। कई बार तो लोग भूलवश प्यास को भूख स
टायफॉइड में ना करें लापरवाही

टायफॉइड में ना करें लापरवाही

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दूषित पानी और खानपान की वजह से होने वाली बीमारी टायफॉइड साल्मोनेला टाइफी नामक बैक्टीरिया से होती है। तेज बुखार से शुरू होने वाली यह बीमारी अल्सर या आंतों के फटने की वजह भी बन सकती है, इसलिए सही समय पर टायफॉइड का इलाज होना जरूरी है। यह बीमारी संक्रामक भी है, जो रोगग्रसित व्यक्ति के जूठे भोजन या पानी पीने से भी हो सकती है। कई मरीजों में यह बीमारी ड्रग रेसिस्टेंड (रोगी पर दवाइयों का असर नहीं होता) भी होने लगी है, जिसकी वजह से डॉक्टर ओरल दवाइयों की जगह इंजेक्शन देते हैं। १०-१५ मरीजों में से एक में इस तरह की समस्या सामने आ रही हैं। लक्षण100 डिग्री सेल्सियस से ऊपर लगातार बुखार बने रहना, पेट दर्द, भूख ना लगना, सिर दर्द व गले में खराश, सुस्ती या कमजोरी लगना और शरीर पर चकत्ते दिखाई देना। ऐसे होगा बचावटायफॉइड होने पर दूषित खानपान से बचें। जहां तक हो पानी उबालकर पीएं। सब्जियों को अच्छे से पकाएं और फल
लंबी उम्र पाने के खास फॉर्मूले

लंबी उम्र पाने के खास फॉर्मूले

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अगर महिलाएं और पुरुष अपनी सेहत के प्रति सजग रहें और कुछ सावधानियां बरतें तो लंबी उम्र पा सकते हैं। आइए जानते हैं उपायों के बारे में। खुद पर नियंत्रण रखेंडायबिटीज, किडनी की समस्या, ब्लड प्रेशर या किसी अन्य बीमारी से पीडि़त हैं, तो खानपान का ध्यान रखें, दवा लेने में किसी प्रकार की लापर वाही ना करें, डॉक्टर से नियमित चेकअप कराएं और जरूरत के हिसाब से ब्लड टेस्ट भी। व्यायाम, मेडिटेशन या योगा करें। तंबाकू और एल्कोहल का सेवन ना करें। रेगुलर चेक अप कराएंहर साल दिल की धडक़न, हृदय, फेफड़े और पेट की स्थिति, आंखों एवं दांतों आदि का चेक अप करवाएं। डॉक्टरी सलाह से ब्लड व यूरिन टेस्ट भी कराएं। बीएमआई रखें सही ३० से अधिक बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई)होना मोटापे का संकेत है, जो आर्थ राइटिस, डायबिटीज, ब्लड प्रेशर और कैंसर जैसी बीमारियों का सबब बन सकता है। २० से कम बीएम आई यानी ‘साइज जीरो’ का अर्थ है
डिप्रेशन को दूर भगाने के लिए जरूर खाएं ये 5 सुपरफूड

डिप्रेशन को दूर भगाने के लिए जरूर खाएं ये 5 सुपरफूड

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डिप्रेशन या अवसाद ऐसी समस्‍या है, जिसका समय रहते पता न चले तो बात बहुत गंभीर हो जाती है। इस बीमारी का संबंध दिमाग में सूजन या हलचल से होता है। मानसिक सेहत को दुरुस्‍त रखने के लिए दिमागी... Live Hindustan Rss feed
हृदय संबंधी रोग भी बनाते एऑर्टिक डिस्सेक्शन की स्थिति

हृदय संबंधी रोग भी बनाते एऑर्टिक डिस्सेक्शन की स्थिति

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एऑर्टिक डिस्सेक्शन हृदय से जुड़ी ऐसी बीमारी है जिसमें ५० प्रतिशत मरीजों की समय पर इलाज न मिलने पर अगले २४-४८ घंटों में मौत हो जाती है। किसी सडक़ दुर्घटना में सीने पर आए दबाव या हृदय से जुड़े रोगों के कारण इसके मामले भी काफी देखे जाते हंै जिसके लिए सर्जिकल इमरजेंसी बेहद जरूरी है। रोग के कारण शरीर की सबसे बड़ी धमनी ‘एऑर्टा’ ऑक्सीजनयुक्त रक्त को सर्कुलेटरी सिस्टम तक पहुंचाने का काम करती है। एऑर्टा डिस्सेक्शन की समस्या में इस धमनी की आंतरिक दीवार क्षतिग्रस्त हो जाती है। ऐसे में रक्त का प्रवाह धमनी के बाहर होने लगता है। यह दो तरह से प्रभावित होती है। टाइप-ए (धमनी के ऊपरी हिस्से का क्षतिग्रस्त होना) और टाइप-बी (धमनी के निचले हिस्से का चोटिल होना)। जटिलताएं इस रोग की वजह से अंदरुनी रक्तस्त्राव से व्यक्तिकी मौत हो सकती है। साथ ही आंतों की कार्यप्रणाली बिगडऩे, किडनी फेल होने, स्ट्रोक व अ
ऐसे आप तक पहुंचता है जई

ऐसे आप तक पहुंचता है जई

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जई यानी ओट्स एक अनाज है। इसकी खेती की तैयारी गेहूं और जौ की तरह ही की जाती है। यह जौ की प्रजाति का पौधा है। सेहत के लिहाज से पौष्टिक होने के कारण धीरे-धीरे इसका उत्पादन बढ़ रहा है। लेकिन जागरुकता की कमी के कारण कम लागत में अधिक फायदा देने वाली इस फसल से किसान दूर हैं। खेती का विज्ञान ओट्स शरद ऋतु की फसल है। इसकी पैदावार के लिए ठंडी और शुष्क जलवायु की आवश्यकता पड़ती है। इसकी बुआई अक्टूबर में की जाती है। कम पानी में भी अच्छी उपज देने वाली यह फसल ४०-११० सेमी. वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में भी आसानी पैदा की जा सकती है। इसकी बुआई करते समय पर्याप्त नमीं की आवश्यकता होती है। यूपीओ-९४, बुंदेल जई ५८१, हरियाणा जई ११४ जई की उन्नत किस्में हैं। इसकी कटाई मार्च में की जाती है। कई तरह से होता है प्रयोग फसल की कटाई के बाद जई को कूटकर दाने और भूसी को अलग करते हैं। भूसी पशुओं के चारे के रूप में प्रयोग होत
गंभीर रोगों में सर्जरी की मदद से होती कम समय में रिकवरी

गंभीर रोगों में सर्जरी की मदद से होती कम समय में रिकवरी

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आमतौर पर चेहरे के दाग-धब्बे और अनचाहे बालों को हटाने के लिए जानी जाने वाली लेजर थैरेपी का इस्तेमाल अब गंभीर बीमारियों के इलाज में भी हो रहा है। इनमें कैंसर, किडनी स्टोन, प्रोस्टेट गं्रथि बढऩे की समस्या, आंखों की रोशनी बढ़ाना आदि है। अन्य थैरेपी के मुकाबले इसमें दर्द, सूजन और धब्बे पडऩे की आशंका कम रहती है। यह है थैरेपी लेजर का पूरा नाम लाइट एम्प्लिफिकेशन बाय स्टिमुलेटेड एमिशन ऑफ रेडिएशन है। ये विशेष प्रकार की किरणें हैं जो सिलेक्टिव फोटोथर्मोलिसिस सिद्धांत पर काम करती हैं। इसमें प्रभावित हिस्से पर एक प्रोब (उपकरण) के माध्यम से तय फ्रीक्वेंसी की किरणें डालते हैं। फ्रीक्वेंसी कितनी हो, यह मर्ज पर निर्भर करता है। ये किरणें गरम होकर प्रभावित हिस्से को जला देती हैं। इससे न तो आसपास की कोशिकाओं को नुकसान होता है व न ही मरीज को जलन होती है। मरीज की किडनी में स्टोन होने पर लेजर प्रोब से स्टोन को ज