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अर्थशास्त्रियों ने तंबाकू उत्पादों पर टैक्स बढ़ाने की मांग की

नई दिल्ली। अर्थशास्त्रियों, डॉक्टरों और लोक स्वास्थ्य के क्षेत्र में सक्रिय संगटनों ने जीएसटी परिषद से अनुरोध किया है कि सिगरेट और बीड़ी जैसे तंबाकू उत्पादों पर टैक्स बढ़ाया जाए। इनका कहना है कि इससे मिलने वाले राजस्व को सरकार हाल में आई केरल की बाढ़ जैसी आपदा के लिए उपयोग कर सकती है।

वोलंट्री हेल्थ एसोसिएशन ऑफ इंडिया (वीएचएआई) की मुख्य कार्यकारी भावना बी मुखोपाध्याय ने कहा, “बीड़ी सहित सभी तंबाकू उत्पादों पर अतिरिक्त उपकर लगाने से लोक स्वास्थ्य और राजस्व प्राप्ति दोनों को बड़ी कामयाबी मिलेगी। इस कदम से जहां सरकार को राजस्व मिलेगा, वहीं लाखों तंबाकू उपयोग करने वाले इस लत को छोड़ेंगे। साथ ही बहुत से युवाओं को तंबाकू का इस्तेमाल शुरू करने से रोका जा सकेगा।”

इनका कहना है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) सिफारिश करता है कि सभी देश तंबाकू उत्पादों पर खुदरा मूल्य का न्यूनतम 75% फीसदी राजस्व कर जरूर लगाएं। इससे तंबाकू उत्पादों के उपयोग को कम करने और सरकारी राजस्व को बढ़ाने के दोहरे लक्ष्य की प्राप्ति होती है। भारत में सभी तंबाकू उत्पादों पर कुल कर की दर अन्य मध्य आय वाले देशों के मुकाबले बहुत कम है। उद्योग जगत के दावों से उलट सच्चाई यह है कि जीएसटी लागू किए जाने के बावजूद तंबाकू उत्पादों और खास कर सिगरेट पर कर में गंभीर बढ़ोतरी नहीं हुई। बल्कि इन सभी तंबाकू उत्पादों को ज्यादा सस्ता बना दिया है। जीएसटी के बाद बीड़ी पर कर सिर्फ 22% है, सिगरेट पर 53% और चबाने वाले तंबाकू पर 60% है। ये सभी उत्पाद डब्लूएचओ की 75% की सिफारिश से कम हैं।

अर्थशास्त्री और स्वास्थ्य नीति के जानकार डॉ. रिजो जॉन कहते हैं, “एक साल से ज्यादा समय से कंपंसेशन सेस में बदलाव नहीं किया गया है, इसलिए यह लोगों की पहुंच में आती जा रही है। ऐसे में सिगरेट पर लगाए जाने वाले सेस की दर में काफी बढ़ोतरी की जरूरत है।”

इसी तरह मैक्स हेल्थकेयर के सर्जिकल आंकोलॉजी के चेयरमैन डॉ. हरित चतुर्वेदी कहते हैं, “इस बात के बहुत साक्ष्य हैं कि बीड़ी गरीबों के आनंद का नहीं बल्कि हत्या का साधन है। गरीबों को जीवन भर की समस्या और पीड़ा से बचाने के लिए इसे ज्यादा से ज्यादा महंगा बनाए जाने की जरूरत है।”

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