News That Matters

इंजीनियर नीतेश ने वेंटिलेटर पर तड़पते मरीजों के लिए बनाया वेप केयर, प्री-मैच्योर बच्चों के लिए ‘सांस’



सीकर29 साल के नीतेश जांगिड़ की पहचान बेहद खास है। नीतेश सीकर के गुंगारा में शिवनगर गांव के रहने वाले हैं। पेशे से बैंगलुरू में इंजीनियर नीतेश को हाल ही में फोर्ब्स ने हेल्थ केयर सेगमेट में उल्लेखनीय योगदान के लिए अपनी मैग्जीन में जगह दी है। इन्हें अब 29 साल के युवा डॉक्टर के तौर पर देखा जा रहा है। इसकी वजह है-दो ऐसे आविष्कार जो, जीवन रक्षक है। पहला है-वेप केयर और दूसरा- ‘सांस’। यह दो उपकरण है, जो मरीजों को नया जीवन दे रहे हैं। नीतेश बैंगलुरू में सीओज लैब के को-फाउंडर है।

सबसे पहले वेप केयर के बारे में पढ़िए। यह उपकरण वेंटिलेटर पर रखे जाने वाले मरीजों में वेंटिलेटर एसोसिएटेड निमोनिया नामक बीमारी को रोक सकता है। यह संक्रामक बीमारी है। बीमारी कितनी खतरनाक है, इसे इस आंकड़े से समझ सकते हैं। देश में छह लाख लोगों को यह बीमारी हर साल होती है, जिसकी वजह से 2.5 लाख लोगों की मौत हो जाती है। पूरी दुनिया में आठ लाख लोग हर साल मर जाते हैं।

इस उपकरण के जरिए इस बीमारी को काफी हद तक रोका जा सकता है। दूसरा उपकरण सांस-प्री-मैच्योर बच्चों के लिए है। मेट्रो सिटी में एनआईसीयू है, लेकिन छोटे कस्बों में यह उपकरण बच्चों को नया जीवन दे सकता है। सांस को बनाने में भारत व यूएस सरकार ने मदद की है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने इस मशीन को स्टूडेंट्स को दिखाने के लिए भी रखा है। सबसे अच्छी बात है-मशीन बिना बिजली के भी इस्तेमाल की जा सकती है।

आइडिया…अस्पताल में मरीज को देखकर वेप केयर बनाया
नीतेश बताते हैं-उनके दादा चाहते थे कि वह डॉक्टर बने। लेकिन, वे बन गए इंजीनियर। नीतेश ने बताया, कुछ साल पहले वे बैंगलुरू के एक अस्पताल में गए थे। वहां एक मरीज को वेंटिलेटर पर देखा। डॉक्टर से बातचीत में पता चला कि वेंटिलेटर पर जब मरीज रहता है तो फेफड़ों में लार पहुंच जाती है। इससे फेफड़े संक्रमित हो जाते हैं। इस वजह से मरीज की मौत हो जाती है। इस बात ने काफी डराया। कई डॉक्टरों से बात की। रिसर्च किया। इसके बाद वेप केयर बनाने का आइडिया मिला। इस मशीन को बनाने में साढ़े तीन साल लगे। यह बनाने के बाद सांस उपकरण बनाया। इस मशीन का वजन सिर्फ 4.7 किलो है।

जानिए…नीतेश के आविष्कार कैसे बचा सकते हैं लाखों जिंदगियां

वेप केयर : यह विश्व का पहला ऐसा उपकरण है, जो वेंटिलेटर एसोसिएटेड निमोनिया को रोकने में मदद करता है। यानी इस सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और सभी अस्पताल एेसे उपकरणों को अपनाने लगे तो दुनिया में हर साल आठ लाख लोगों को बचा सकते हैं।
सांस : बच्चों के फेफड़े डवलप नहीं होने के कारण सांस लेने में तकलीफ होती है। इससे हर साल भारत में लगभग 1.6 लाख शिशु की मौत हो जाती है। इस मशीन को हाथ में लेकर भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इस मशीन को जनवरी में आयोजित हांगकांग में एशिया सोशल इनोवेशन अवार्ड भी मिला है।

Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today


इंजीनियर नीतेश जांगिड़ अपने अविष्कारों के साथ।

Dainik Bhaskar

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *