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शहर के 72 बड़े कोचिंग संस्थानों में से मात्र 8 काे निगम की फायर एनओसी



जयपुर.शहर में 72 बड़े कोचिंग संस्थानों में से मात्र 8 कोंचिंग संस्थानों के पास नगर निगम की फायर एनओसी है। जिन कोचिंग संस्थानों ने फायर एनओसी नहीं ली निगम उन संस्थानों काे एक साल में तीन नोटिस दे चुका लेकिन अब तक कोचिंग संस्थानों ने फायर एनओसी नहीं ली। निगम ने लापरवाही बरतते हुए उन संस्थानों के खिलाफ अब तक काेई कारवाई नहीं की।

सूरत के कोचिंग सेंटर अग्निकांड में 23 छात्रों की माैत के बाद निगम की फायर शाखा काे हाेश आया। जेडीए से फायर सेस के मिले 10 कराेड रुपए का निगम की फायर शाखा उपयोग नहीं कर पाई। तत्कालीन उपायुक्त शिप्रा शर्मा के कार्यकाल के दौरान 2018 में संसाधनों काे खरीदने की टेंडर फाइलें अब तक पड़ी हुई है। निगम के मुख्य फायर ऑफिसर जगदीश फुलवारी ने बताया कि फरवरी 2018 में शहर में कोचिंग संस्थानाें, हाेटलाें, अस्पतालाें, विवाह स्थलों में आग से सुरक्षा के लिए अभियान चलाया गया था। इस अभियान में शहर के 72 बड़े कोचिंग संस्थानों काे चिन्हित कर फायर एनओसी लेने का नोटिस दिया था। इसके बाद मात्र 8 कोचिंग संस्थानों ने ही आग से बचाव के मापदंड पूरे कर एनओसी ली।

केमिकल की आग बुझाने के मास्क ही नहीं
निगम की फायर शाखा के पास कैमिकल की आग बुझाने के मास्क नहीं है। शहर के पांच फायर स्टेशनों पर ही सेल्फ कंटेंट ब्रीथिंग एपरेटस है। उनमें भी कई में आाक्सीजन नहीं है। पुरानी दमकलों में सायरन औैर लाेगाें काे अलर्ट करने के लिए माइक तक नहीं है। दमकल कर्मचारियों का इंश्योरेंस नहीं है। उन्हें मेडिकल भी नहीं मिलता। इसके चलते कर्मचारी आग बुझाने में झिझकते है। कर्मचारियों का कहना है कि फायरमैन भगवान सिंह, राजेश गुर्जर औैर हिमांशु के आग बुझाते समय घायल हाेने पर खुद के पैसों से इलाज करवाया है। निगम की ओर से काेई सहायता नहीं मिली।

20 फायर बाइक काे चलाने वाले नहीं
निगम ने दाे वर्ष पहले 1.44 कराेड रुपए खर्च कर 20 फायर बाइक खरीदी थी। सभी 2 से 4 बाइक काे फायर स्टेशनों काे दे गई। बाइक अब तक काेई काम नहीं आयी। इधर, दमकल बनाने के लिए छह साल पहले खरीदे गए 10 चैचिस पर अब तक दमकल नहीं बनाई गई। खडे हुए चैचिस खराब हाे गए उनकी सर्विस पर 5 लाख रूपए खर्च हाे गए।

आग बुझाने का जिम्मा ठेका कर्मचारियों पर

  • 10 फायर स्टेशन शहर में
  • 57 दमकलों काे चलाने के लिए
  • 15 स्थाई ड्राइवर कर्मचारी हैं।
  • 94 ठेके के ड्राइवर है।
  • 8 रिटायरमेंट के नजदीक है स्थाई ड्राइवरों में भी।
  • 132 फायरमैन है निगम के ताे 150 ठेके पर लिए फायरमैन है।
  • 171 ड्राइवरों की आवश्यकता है दमकलों काे चलाने के लिए तीन शिफ्ट में जहां वहीं मात्र 104 ड्राइवर ही मौजूद है।
  • 57 में से 33 दमकलों पर ही ड्राइवर हैं तीन शिफ्ट में कार्य करने पर, बाकी 20 दमकलें खड़ी रहती हैंै।
  • 513 फायरमैन की जरूरत है लेकिन कुल 282 फायरमैन है। जिनमें 132 निगम के है औैर 150 ठेके पर लिए हुए है।

मुख्य दरवाजा व सीढ़ियां ही लकडी की बना दी

गाेपालपुरा बाईपास पर चार मंजिला एक काेचिंग सेंटर का मुख्य दरवाजा और सीढ़ियां लकडी की बनी है। काेचिंग सेटर में आने-जाने का एक मात्र रास्ता है। दरवाजे पर ही प्लाई बाेर्ड में बिजली के मुख्य स्विच लगे है ऐसे में दरवाजे में आग लग जाए ताे अंदर छात्राें का फंसकर हादसा हाेना तय है।भारतीय जनता युवा मोर्चा के अखिलेश पारीक ने कलेक्टर जगरूप सिंह यादव काे ज्ञापन साैंप कर गाेपालपुरा बाईपास पर चल रहे कोचिंग संस्थानों में सूरत जैसा अग्नि कांड नहीं हाे इसके लिए आवश्यक कारवाई करने की मांग की है।

गोपालपुरा बाईपास व्यापारियों ने उठाई कोचिंग के खिलाफ आवाज

सूरत हादसे के बाद जेडीए-नगर निगम के स्तर पर बगैर कन्वर्जन और फायर फाइटिंग के हाइराइज बिल्डिंग पर कार्रवाई की मांग तेज हो रही है। निगम द्वारा फायर एनओसी में नियमों की अनदेखी और जेडीए की ओर से अवैध कोचिंग संस्थानों को शह देने के आरोप हैं। शहर में हाइराइज-व्यावसायिक भवनों में कभी भी आग के अंदेशे हैं।

गोपालपुरा बाईपास पर अवैध कोचिंग संस्थानों को लेकर सरकार और जेडीए फैसला नहीं कर रहा। गोपालपुरा बाईपास व्यापार मंडल के अध्यक्ष पवन गोयल ने कहा ज्यादातर इंस्टीट्यूट में न तो फायर फाइटिंग सिस्टम है और न ही आपातकालीन द्वार। गलियों में इंस्टीट्यूट घरों में चल रहे हैं। अवैध पार्किंग से 160 फीट रोड पर भी जाम की स्थिति रहती है। मकान मालिक को किराए का लोभ है तो कोचिंग संचालक को मोटी फीस का। सरकार को चाहिए कि वो इन कोचिंग सेंटर्स के लिए संस्थानिक एरिया बनाकर शिफ्ट करे।

फायर फाइटिंग सिस्टम जरूरी, जहां 20 से ज्यादा लोग इकट्ठे हो
मसला अकेले कोचिंग सेंटर का ही नहीं है। कल कोचिंग में आग लगी है, इससे पहले रूफ टॉप पर लगी थी, फिर कहीं और आग लग सकती है। मसला यह है कि जहां कहीं भी असेंबली बिल्डिंग है, 20 से ज्यादा लोग इकट्ठे होते हैं, वहां फायर इंतजाम हों। फायर की कम्प्लाइंस नहीं हुई तो कन्वर्जन बिना भी हादसे हो जाएंगे। जिसने बिल्डिंग बनाई है और जिसने किराए पर ली है, दोनों जिम्मेदार हैं। -आरके विजयवर्गीय, डायरेक्टर टाउन प्लानिंग

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