News That Matters

ज़िंदगी में आप हारकर भी जीत सकते हैं!




ऐसे समय में जब 154 शहरों के 13 लाख से ज्यादा छात्र 2019 की नीट परीक्षा (NEET) के परिणाम का इंतजार कर रहे थे, एक ऐसा व्यक्ति भी नज़रे जमाए बैठा था, जिसने यह परीक्षा नहीं दी थी। झारखंड के देवघर में जन्मे अजय बहादुर सिंह को ऐसे 14 छात्रों के नीट परिणाम का इंतजार था, जो बेहद गरीब पृष्ठभूमि से हैं। आखिर में उसे वह खुशी मिल ही गई, क्योंकि सभी 14 बच्चे नीट में सफल हो गए थे।

इस खुशी के पीछे एक कहानी है। अजय से ज्यादा, यह उनके पिता का सपना था कि वे डॉक्टर बनें। हालांकि, पिता के किडनी ट्रांसप्लांट के खर्च की वजह से परिवार गरीबी में घिर गया और मेडिकल प्रवेश परीक्षा के लिए कोचिंग ले रहे अजय को अपनी तैयारी को गुडबाय कहना पड़ा। परिवार को सहारा देने के लिए उन्होंने चाय, सोडा और शरबत बेचा, ट्यूशन पढ़ाई और शादी व धार्मिक समारोह में कई छोटे-मोटे काम तक किए। उन्होंने संकल्प लिया कि वे खुद नहीं बन पाए तो क्या दूसरों को डॉक्टर बनाएंगे। फिर उन्होंने ‘ज़िंदगी फाउंडेशन’ नाम की संस्था बनाई जो गरीबी में पले बच्चों को मुफ्त में कोचिंग देती है। नीट में सफल हुए सभी 14 बच्चे इसी फाउंडेशन के हैं।

मुझे इस वाकये से मशहूर कार्डियक सर्जन डॉ देवी शेट्टी का ध्यान आता है, जो नारायण हृदयालय के संस्थापक हैं। 2017 में एक मीडिया टॉक शो के दौरान उन्होंने इस बात पर पीड़ा व्यक्त की थी कि मेडिकल की पढ़ाई में अमीरों का एकछत्र दबदबा होता जा रहा है और भारी खर्च के कारण कोई गरीब इस बारे में सोच भी नहीं सकता। अपने कॉलेज के दिनों का जिक्र करते हुए डॉ. शेट्‌टी ने कहा कि जब वे एमबीबीएस कर रहे थे तो उस समय गरीब घरों के बच्चे भी इस पेशे को अपनाते थे। उन्होंने अपने अनुभव से कहा, ‘गरीब घरों से निकले उनके समय के बच्चे कमाल के डॉक्टर बने, दुनियाभर ने उनकी उंगलियों के जादू का लोहा माना और पेट में लगातार 24 घंटे काम करने की आग लिए ऐसे डॉक्टरों ने खेल के नियम ही बदल दिए।’ उन्होंने अमेरिका का उदाहरण देते हुए सवाल उठाया कि जब वहां के कैरेबियन आइलैंड में एक मॉल के ऊपर सिर्फ 50 हजार वर्ग फीट जगह में डॉक्टरों को ट्रेनिंग दी जा सकती है, जबकि वहां पर 35 मेडिकल कॉलेज है, तो क्यों भारत में एक मेडिकल कॉलेज खोलने पर 400 करोड़ रुपए खर्च किए जाते हैं, जिससे मेडिकल शिक्षा गरीबों के बूते से बाहर हो जाती है?’

डॉ. शेट्‌टी की यह बात बिलकुल सही है। इसे ट्विंकल साहू के उदाहरण से समझिए। फाउंडेशन की मदद से नीट में सफल हुई ट्विंकल पुरी में भगवान जगन्नाथ के मंदिर के बाहर फूल बेचने का काम करती थी। हालांकि, आगे कॉलेज की फीस न भर पाने के डर से उसके पिता घर छोड़कर चले गए। जब अजय को यह बात पता चली तो उन्होंने अपने स्टाफ की मदद से चार दिन बाद उसके पिता को खोजा और उनसे वादा किया वे ट्विंकल की फीस का ध्यान रखेंगे। 2017 में शुरू हुई ‘जिंदगी फाउंडेशन’ नीट में सफल होने के लिए मुफ्त कोचिंग, मुफ्त स्टडी मटेरियल के साथ गरीब घर से आए होनहार बच्चों को रहने की सुविधा भी मुहैया कराती है। अपने कार्य की शुरुआत के पहले वर्ष के दौरान, अजय के पास आए 18 में से 12 छात्रों ने ओडिशा के मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश पाने में सफलता मिली। अजय अगर उस समय डॉक्टर बन जाते तो हजारों लोगों की जान बच सकती थी, लेकिन आज वे इन गरीब बच्चों को डॉक्टर बनाकर लाखों और करोड़ों की जान बचाएंगे। वे अपने मेडिकल छात्रों को एक ही सलाह देते हैं कि सेवा-कार्य ऐसा हो कि उनके पास आया कोई भी मरीज दूसरा परामर्श लेने के लिए किसी अन्य डॉक्टर के पास न जाए। अजय कहते हैं, ‘अगर वे मरीजों में ऐसा भरोसा कायम कर देते हैं, तो मैं समझूंगा कि उन्होंने मुझे गुरु दक्षिणा दे दी है’।

फंडा यह है कि  अगर आप कोई सपना पूरा नहीं कर पाते हैं तो दूसरों के वैसे ही सपने को पूरा करने में मदद करें, क्योंकि ऐसा होने पर आप हारकर भी जीत जाते हैं!

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in

Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today


Bar News – rajasthan news you can also win by losing in life


Bar News – rajasthan news you can also win by losing in life

Dainik Bhaskar

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *