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Blinking Eyes से तेज होता है दिमाग और बढ़ती है याददाश्त, यहां जानें कैसे?

Blinking Eyes से तेज होता है दिमाग और बढ़ती है याददाश्त, यहां जानें कैसे?

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इस जगत में भला ऐसा कौन प्राणी होगा, जो तेज दिमाग न चाहता हो। सच तो यह है कि हर कोई तेज दिमाग चाहता है, शार्प मेमोरी चाहता है। इतना ही नहीं पैरेंट्स के लिए हमेशा इस बात की चिंता सताती है कि उनके बच्चों का दिमाग तेज कैसे हो? याददाश्त क्षमता में वृद्धि कैसे हो। यहां हम आपको बताना चाहते हैं कि दिमाग को तेज करने और याददाश्त क्षमता में वृद्धि करने के अनेकों तरीके हैं। इनमें सबसे ज्यादा बादाम पर जोर दिया जाता है। सवाल यह उठता है कि क्या वाकई बादाम से दिमाग को तेज और याददाश्त को बढ़ाया जा सकता है। हम आपको बता दें कि बादाम को भले ही दिमाग को तेज करने व मेमोरी बढ़ाने का अचूक नुस्खा माना जाता है, लेकिन इस बारे में वैज्ञानिकों का कहीं कोई उल्लेख नहीं मिलता है। इसके अलावा भी ढेरों ऐसे उपाय बताए जाते हैं, जो हैल्दी दिगाग के लिए कितने उपयुक्त है, इसे बारे में कुछ भी कहना सही नहीं होगा। हां, हम यहां दिमाग
वजन कम करने में मददगार साबित हो सकता है कार्बोहाईड्रेट युक्त भोजन

वजन कम करने में मददगार साबित हो सकता है कार्बोहाईड्रेट युक्त भोजन

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फलों, सब्जियों और खड़े अनाज से मिलने वाले कार्बोहाईड्रेट से भरपूर भोजन वजन कम करने और ज्यादा वजन वाले लोगों में इंसुलिन की स्थिति बेहतर बनाता है। अमेरिका की गैर लाभकारी 'फिजिशियंस कमेटी फॉर... Live Hindustan Rss feed
अब कैल्कुलेटर बताएगा कि बच्चों को कितना चाहिए प्रोटीन

अब कैल्कुलेटर बताएगा कि बच्चों को कितना चाहिए प्रोटीन

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नई दिल्ली। कैल्कुलेटर एप बताता है कि आपको अपने भोजन में कितनी मात्रा में प्रोटीन लेनी चाहिए। इस एप को लॉन्च करने वाली कंपनी है एफएमसीजी डायरेक्ट सेलिंग में अग्रणी एमवे इंडिया, जिसने बच्चों में प्रोटीन की कमी दूर करने के लिए एक विशेष अभियान चलाया है। एमवे इंडिया ने 'प्रोटीन 4 चिल्ड्रन' नाम से एक अभियान चलाया है जिसमें बच्चों के पोषण के लिए प्रोटीन की जरूरतों से उनके माता-पिता व अभिभावकों अवगत कराया जाता है। एमवे इंडिया के मुख्य विपणन अधिकारी संदीप शाह ने कहा, "जर्नल ऑफ फैमिली मेडिसिन एंड प्राइमरी केयर की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में करीब 50 फीसदी बच्चों में प्रोटीन की कमी है। इसलिए बच्चों में प्रोटीन की कमी को दूर करने के लिए यह अभियान चलाया गया है।" कंपनी की ओर से जारी एक विज्ञप्ति में कहा गया कि इंडियन मेडिकल गजट में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन के अनुसार भारत में प्रोटीन का अभाव एक बड़ी चि
चीज-पनीर हेल्थ के लिए फायदेमंद है या नहीं, यहां जानें

चीज-पनीर हेल्थ के लिए फायदेमंद है या नहीं, यहां जानें

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सब्जियां हों या फास्ट फूड, चीज बिना सब अधूरे ही लगते हैं। खासतौर से मौजूदा दौर में कई डिशेेज में तो चीज का प्रयोग सर्वाधिक हो रहा है। हम आपको बता दें कि चीज न सिर्फ खाने का स्वाद बढ़ाता है, बल्कि यह पौष्टिक तत्वों से भी भरपूर होता है। चीज के साथ पनीर का भी काफी पसंद किया जाता है। पनीर से कई तरह की डिशेज बनाई जाती हैं। घर हो रेस्टोरेंट, भोजन में पनीर की सब्जी की डिमांड सबसे ज्यादा है। चीज की तरह पनीर भी पौष्टिक तत्वों से भरपूर है। ये दोनों चीजें हेल्थ के लिए फायदेमंद हैं, लेकिन इनके नुकसान भी हैं। तो आइए जानते हैं कि चीज और पनीर हेल्थ के लिए कितना फायदेमंद है और कितना नुकसानदेह। प्रोटीन का स्रोत है पनीरडाइटीशियन डॉ. अनामिका सेठी के अनुसार, पनीर से प्रोटीन प्रचुर मात्रा में मिलता है। पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ाकर तैयार किए गए फोर्टिफाइड पनीर में विटामिन ए और विटामिन डी अधिक मात्रा में होता है
देसी तकनीक से दी जाएगी बीमारियों को मात

देसी तकनीक से दी जाएगी बीमारियों को मात

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दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना के शुभारंभ के साथ ही हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर की स्थापना में भी अब तेजी शुरू होगी। रविवार को झारखंड के रांची में प्रधानमंत्री जनआरोग्य योजना का शुभारंभ करने के साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर को भी शुरू किया। स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, इन सेंटर पर लोगों को कैंसर, मधुमेह, हाइपरटेंशन और किडनी जैसी बीमारियों का उपचार मिलेगा। उप स्वास्थ्य केंद्रों को तकनीक के जरिए नया रूप देने के बाद यहां आयुर्वेद और एलोपैथी का मिश्रित उपचार मिल सकेगा। इसके लिए भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर), सीएसआईआर और डीआरडीओ के शोधों को शामिल किया है। इसमें सरकार की नीरी केएफटी, बीजीआर-34, ल्यूकोस्किन इत्यादि का समावेश है। स्वास्थ्य मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि 30 वर्ष की उम्र में प्रत्येक व्यक्ति की स्क्रीनिंग शुरू की जाएगी। इस
यूथ को लगी नई बीमारी ‘स्लीप टेक्सटिंग’

यूथ को लगी नई बीमारी ‘स्लीप टेक्सटिंग’

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नींद में चलने की बीमारी के बारे में तो सभी ने सुना है, लेकिन अब ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है, जो नींद में अपने मोबाइल या कम्प्यूटर का उपयोग करते हैं। चिकित्सा विज्ञान में इसे ‘सोमनाबुलिज्म’ कहा जाता है। मस्तिष्क के मैकेनिज्म में असंतुलन के कारण होने वाली इस बीमारी में मरीज नींद में उठता है और कोई गतिविधि कर लेता है, लेकिन खुद उसे ही पता नहीं चलता। जोधपुर के सम्पूर्णानन्द मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर एवं वरिष्ठ मनोरोग-चिकित्सक डॉ. जी.डी. कूलवाल बताते हैं कि सोमनाबुलिज्म में व्यक्ति कोई सामान्य या जटिल कार्य को भी अंजाम दे सकता है। वे इसे ‘हिस्टेरिकल डिस-एसोसिएशन रिएक्शन’ (एचडीआर) भी बताते हैं। युवा इसके ज्यादा शिकार हैं। नींद में भेजे गए संदेश होते हैं ऊल-जुलूल मोबाइल और कम्प्यूटर पर बढ़ती निर्भरता इसका एक कारण होती है। स्लीपिंग-डिसऑर्डर में मरीज गहरी नींद में नहीं होत
मेमोरी शार्प करती हैं अच्छी किताबें

मेमोरी शार्प करती हैं अच्छी किताबें

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अगर हम आपको कहें कि किताब पढऩे से आपके दिमाग में सकारात्मक बदलाव आते हैं तो कैसा रहे? निश्चित तौर पर आप खुश होंगे। अमरीकी शोधकर्ताओं ने पाया है कि अच्छी किताबें पढऩे से दिमाग की थोट्स टू एक्शन पावर यानी किसी काम को करने के लिए दिमाग में विचार की गतिविधियां सक्रिय होती हैं। इससे दिमाग किसी भी विषय को जल्दी याद कर पाता है। जॉर्जिया, अटलांटा की इमोरी यूनिवर्सिटी की यह रिसर्च जर्नल ब्रेन कनेक्टिविटी में प्रकाशित हुई है। बेस्ट फ्रैंड हैं किताबें रिसर्च के मुताबिक अच्छी कहानियां पढऩे से दिमाग के काम करने का तरीका भी बदला जा सकता है। अगर आप कुछ ज्यादा ही नकारात्मक सोचते हैं, तो अच्छी किताब पढक़र आप इसे पॉजिटिव बना सकते हैं। रिसर्च में यूनिवर्सिटी ने २१ विद्यार्थियों को रॉबर्ट हारिश की किताब ‘पॉम्पेई’ पढऩे के लिए दी। १९ दिन की निगरानी में दिमाग का बायां हिस्सा सक्रिय पाया गया। तंत्रिका
जाने-अंजाने में आप कहीं कैंसर डाइट तो नहीं ले रहे

जाने-अंजाने में आप कहीं कैंसर डाइट तो नहीं ले रहे

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इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहेंगे कि कभी कैंसर जैसी बीमारी केवल फिल्मों में ही दिखाई देती थी। आज यही बीमारी हर तीसरे आदमी को होने लगी है। क्या इसके लिए हमारा खानपान तो जिम्मेदार नहीं? कुछ भी हो लेकिन यह जरूर है कि हम जाने-अंजाने में ऐसी वस्तुओं का इस्तेमाल कर रहे हैं जो कि ना चाहते हुए भी हमें कैंसर जैसी घातक बीमारी की ओर धकेल रही है। गौरतलब है कि इनमें से ज्यादातर चीजें आधुनिक जीवनशैली से जुड़ी हुई हैं। फल और सब्जियांगंदे नालों के पानी से सब्जी-फल पैदा किए जा रहे हैं। अच्छी पैदावार के लिए इनसेक्टिसाइडस, पेस्टीसाइडस और केमिकल फर्टिलाइजर्स का अत्यधिक इस्तेमाल हो रहा है। डीडीटीए नाइट्रेट और फास्फेट खेतों में डाला जा रहा है। ये सब कैंसर का खतरा बढ़ाते हैं। डिटर्जेंट और कीड़े-मकौड़े की दवाइनमें अल्काइल फिनोल, ट्राईक्लोसन और टेट्राक्लोरोएथलिन रसायन हैं। ये हारमोन और एन्डोक्राइन सिस्टम को प्रभ
हाफ नी रिप्लेसमेंट से घुटना होगा नया जैसा

हाफ नी रिप्लेसमेंट से घुटना होगा नया जैसा

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हमारे शरीर का सबसे ज्यादा भार घुटनों के जोड़ों पर पड़ता है। इसीलिए घुटनों के जोड़ हमारे शरीर के सबसे महत्वपूर्ण जोड़ों में से एक है। जब इनकी कार्यक्षमता कम हो जाती है और चलने-फिरने में असमर्थ हो जाते हैं तो हड्डी रोग डॉक्टर घुटने के जोड़ का रिप्लेसमेंट सर्जरी करने की सलाह देते हैं, जिसमें पूरा जोड़ बदला जाता है। लेकिन अब घुटने के जोड़ों का खराब हुई आंशिक हिस्सा भी बदला जा सकता है, जिसे हाफ नी रिप्लेसमेंट सर्जरी कहा जाता है। सिर्फ खराब हिस्सा बदलने की जरूरतसीनियर ज्वांइट रिपलेसमेंट सर्जन डॉ. एसएस सोनी बताते हैं किए हॉफ नी रिपलेसमेंट सर्जरी बेहद कारगर है। खासतौर पर युवाओं में जब जोड़ों में खराबी आती है, तब जरूरत के हिसाब से खराब भाग को बदल दिया जाता है। डॉ.सोनी ने बताया कि घुटने के जोड़ जांघ की हड्डी, टांग की निचली हिस्से की बड़ी हड्डी और घुटने को जोड़ को ढकने वाली हड्डी, तीन हड्डियों से मिल
गुड न्यूज नहीं होती फैंटम प्रेग्नेंसी

गुड न्यूज नहीं होती फैंटम प्रेग्नेंसी

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अपनी बढ़ती टमी और चक्कर आने की स्थिति को कई महिलाएं गर्भावस्था समझ लेती हैं। लेकिन चेकअप के लिए डॉक्टर के पास पहुंचने पर उन्हें पता चलता है कि वे गर्भवती नहीं हैं बल्कि किसी और वजह से बीमार हैं। इस अवस्था को फैंटम प्रेग्नेंसी, फॉल्स प्रेग्नेंसी या सियोडोसिएसिस कहते हैं। ये हैं लक्षण आमतौर पर इस स्थिति में किसी भी महिला के लक्षण एक सामान्य गर्भवती महिला के समान ही होते हैं जैसे वजन बढऩा, चक्कर आना, सुबह उठने पर थकान लगना, जी घबराना या उल्टियां होना, माहवारी में अनियमितता या ब्रेस्ट के आकार में परिवर्तन होने पर महिला खुद को प्रेग्नेंट समझने लग जाती है। कैसे पता चलता है जब कोई महिला डॉक्टर के पास जाती है तो उसकी प्रेग्नेंसी जांच के लिए पेल्विस एग्जामिनेशन और अल्ट्रासाउंड किया जाता है। अल्ट्रासाउंड के दौरान जब कोई बच्चा दिखाई नहीं देता या कोई धडक़न सुनाई नहीं देती तो डॉक्टर इसे फैंटम प्रेग्नेंस