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Tag: इनफर्टिलिटी

इनफर्टिलिटी की जांच व इलाज में अल्ट्रासाउंड व एमआरआई की नई तकनीक खूब मददगार

इनफर्टिलिटी की जांच व इलाज में अल्ट्रासाउंड व एमआरआई की नई तकनीक खूब मददगार

Haryana
पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय के रेडियो डायग्नोसिस विभाग व इंडियन रेडियोलॉजिकल एंड इमेजिंग एसोसिएशन के जरिए संयुक्त रूप से लेक्चर थियेटर पांच में इमेजिंग इन इनफर्टिलिटी- रीसेंट एडवांसेज विषय पर अपनी वार्षिक कांफ्रेंस का आयोजन किया गया। कांफ्रेंस का शुभारंभ मुख्यअतिथि के रूप में उपस्थित कुलसचिव डॉ. एचके अग्रवाल, निदेशक डॉ. रोहताश कंवर यादव व एसोसिएशन के सचिव डॉ. रामबक्श शर्मा ने दीप प्रज्जवलित करके किया। इस दौरान आयोजक डॉ. ज्योत्सना सेन, डॉ. शैलेंद्र अग्रवाल, डॉ. रामबक्श आदि मौजूद रहे। डॉ. रोहताश यादव ने कहा कि इस प्रकार की कांफ्रेंस से चिकित्सकों व पीजी छात्रों का मार्गदर्शन होता है। कांफ्रेंस का शुभारंभ करते मुख्य अतिथि। डॉ. रामेंद्र बने अध्यक्ष इंडियन रेडियोलॉजिकल एंड इमेजिंग एसोसिएशन हर वर्ष अपनी वार्षिक कांफ्रेंस का आयोजन करती है, इसमें करीब
टेक्नोलॉजी गैजेट्स के ज्यादा इस्तेमाल से हो सकती है इनफर्टिलिटी की समस्या

टेक्नोलॉजी गैजेट्स के ज्यादा इस्तेमाल से हो सकती है इनफर्टिलिटी की समस्या

Health
अध्ययन बताते हैं कि मोबाइल फोन एवं उनके टावरों से उत्सर्जित इलेक्ट्रोमैग्नेटिक विकिरण के असर से डीएनए क्षतिग्रस्त होता है और वह स्वयं अपनी मरम्मत नहीं कर पाता। इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है, मेलाटोनिन हार्मोन का स्तर गिर जाता है और कोशिकाओं को नुकसान होने के साथ ही कई दुष्प्रभाव होते हैं। लेकिन इनमें सबसे ज्यादा गंभीर जोखिम है इनफर्टिलिटी। लगभग 15 प्रतिशत भारतीय दंपति किसी न किसी किस्म की इनफर्टिलिटी से जूझते हैं। अध्ययन बताते हैं कि मोबाइल फोन इस्तेमाल का संबंध पुरुषों में शुक्राणुओं के कम उत्पादन व उनकी निम्र गुणवत्ता से है जबकि गर्भस्थ महिलाओं व उनके अजन्मे शिशु के लिए सेल्युलर रेडिएशन का संपर्क खतरनाक होता है। इससे गर्भस्थ शिशु की रीढ़ पर बुरा असर पड़ता है। रेडिएशन से डीएनए के गुणसूत्र क्षतिग्रस्त हो जाते हैं और जीन्स की गतिविधि में बदलाव आ जाता है। आज के दौर में मोबाइल फोन व
आईवीएफ की नई तकनीक से पुरुषों की इनफर्टिलिटी में होगा सुधार

आईवीएफ की नई तकनीक से पुरुषों की इनफर्टिलिटी में होगा सुधार

Health
नए आनुवांशिकीय परीक्षणों ने पुरुष बंध्यता की जटिलताओं का पता लगाकर आईवीएफ की सफलता को बेहतर बनाया है। प्री-इम्प्लांटेशन जैनेटिक स्क्रीनिंग एक स्वस्थ और सुरक्षित गर्भाधान में मदद करती है। बार-बार गर्भपात की स्थिति झेल रहे दंपतियों को किसी भी अन्य परीक्षण से पहले शुक्राणु विश्लेषण के बारे में सोचना चाहिए, क्योंकि इस बात की काफी संभावना रहती है कि मूल कारण शुक्राणु विकृति हो। इनफर्टिलिटी विशेषज्ञ कहते हैं कि यह नई तकनीक 'प्री-इम्प्लांटेशन जैनेटिक स्क्रीनिंग भू्रण में मौजूद किसी भी आनुवांशिक गड़बड़ी की सफलतापूर्वक जांच करती है। यह गड़बड़ी खराब शुक्राणुओं की वजह से होती है। कारगर तकनीक - पीजीएस यानी प्री-इम्प्लांटेशन जैनेटिक स्क्रीनिंग ऐसी तकनीक है, जो किसी भी आनुवांशिक गड़बड़ी के लिए सभी 24 गुणसूत्रों को जांचती है और गर्भाधान की दर बढ़ाने के लिए सटीक परीक्षण करती है। इससे सेहतमंद, रोग-मुक्त भ्
40 फीसदी पुरुष अपनी इनफर्टिलिटी से अनजान

40 फीसदी पुरुष अपनी इनफर्टिलिटी से अनजान

Health
कई महिलाओं को स्वाभाविक रूप से गर्भ धारण करने में मुश्किल आती है। यहां तक कि कई परीक्षण रिपोर्ट सामान्य होने के बाद वे स्वाभाविक रूप से गर्भ धारण में असमर्थ रहती हैं। पुरुषों में इनफर्टिलिटी उन प्रमुख कारकों में से एक है। पुरुषों में शुक्राणु की गुणवत्ता और उसकी मात्रा गर्भ धारण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और यह पुरुष प्रजनन क्षमता का एक निर्णायक कारक भी है। यदि स्खलित शुक्राणु कम हों या खराब गुणवत्ता के हों तो गर्भ धारण करने की संभावनाएं 10 गुना कम और कभी-कभी इससे भी कम हो जाती है। दिल्ली के इंदिरा आईवीएफ हॉस्पिटल की आईवीएफ एक्सपर्ट डॉ. सागरिका अग्रवाल का कहना है - मेल फैक्टर इनफर्टिलिटी असामान्य या खराब शुक्राणु के उत्पादन के कारण हो सकती है। पुरुषों में यह संभावना हो सकती है कि उनके शुक्राणु उत्पादन और विकास के साथ कोई समस्या नहीं हो, लेकिन फिर भी शुक्राणु की संरचना और स्खलन की