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Kalank Review: प्यार और बदले की एक अनोखी कहानी दिखाती है ‘कलंक’

Kalank Review: प्यार और बदले की एक अनोखी कहानी दिखाती है ‘कलंक’

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फिल्म: कलंकस्टार कास्ट: वरुण धवन, आलिया भट्ट, आदित्य रॉय कपूर, सोनाक्षी सिन्हा, माधुरी दीक्षित, संजय दत्तडायरेक्टर: अभिषेक वर्मनकहानी: फिल्म की कहानी भारत-पाकिस्तान के अलग होने से... Live Hindustan Rss feed

Movie Review: KALANK lacks soul and is disappointing

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At one time, multi-starrers were in vogue but of late, such films barely come out of Bollywood. A few franchises like GOLMAAL and HOUSEFULL have kept this tradition alive. Even DHAMAAL can be counted here and its recent instalment TOTAL DHAMAAL was one of the biggest multi-starrers in a long time as Ajay Devgn, Anil Kapoor and Madhuri Dixit got added to the star cast. KALANK goes one step ahead as it stars six actors, all of whom are big and prominent names in their own right. So does KALANK manage to be a memorable multi-actor flick, replete with ample entertainment and drama? Or does it fail to entertain? Let’s analyse. <img class="aligncenter wp-image-971649 size-full" title="Kalank Movie Review" src="https://www.bollywoodhungama.com/wp-content/uploads/2019

MOVIE REVIEW: आत्मा

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हम दर्शकों की चहल-पहल से अंदाजा लगा सकते हैं कि कोई हॉरर फिल्‍म उन्‍हें डराने में कामयाब हो पा रही है या नहीं। इससे फर्क नहीं पड़ता कि फिल्‍म बहुत अच्‍छी है या बहुत बुरी, दर्शक हंसते जरूर हैं। लेकिन हमें यह पता करना होता है कि कहीं दर्शकों की सिट्टी-पिट्टी तो गुम नहीं है और कहीं वे अपना डर भगाने के लिए तो नहीं हंस रहे हैं?वर्ष 2003 की फिल्‍म भूत को याद करें। या कहीं ऐसा तो नहीं कि दर्शक इसलिए हंस रहे हैं, क्‍योंकि उन्‍होंने जिसे हॉरर फिल्‍म समझा था, वह तो कॉमेडी है। और अब वर्ष 2012 की फिल्‍म 'भूत रिटर्न्‍स' याद करें।मैं जिस थिएटर में यह फिल्‍म देख रहा था (यह एक प्रेस प्रिव्‍यू था और वहां अच्‍छी-खासी तादाद में लोग मौजूद थे), वहां मैं लगातार दूसरी तरह की हंसी सुनता रहा। लोग किसी डर को दबाने के बजाय मजे से हंस रहे

MOVIE REVIEW: BOMBAY TALKIES

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सौवीं सालगिरह पर एक बेहतरीन भेंटमेरा खयाल है कि इलाहाबाद के सभी लोगों को कहीं न कहीं अमिताभ बच्‍चन के बारे में यह लगता है कि वे उनके ‘घर के आदमी’ हैं। अनुराग कश्‍यप की फिल्‍म का मुख्‍य चरित्र भी यहां ऐसा ही सोचता है। एक पीढ़ी पहले बिहारी शत्रुघ्‍न सिन्‍हा के बारे में इसी तरह से महसूस करते थे।शायद यह दर्शकों के लिए स्‍वाभाविक ही है कि वे स्‍क्रीन पर बार-बार देखे गए चेहरों से एक खास किस्‍म का रिश्‍ता बना लें। एक समय के बाद उन्‍हें यह भी लगने लगता है कि परदे पर नजर आने वाले चेहरे भी उन्‍हें देख सकते हैं और यह एक किस्‍म का आपसी रिश्‍ता है। ऐसे में यदि सितारे में दर्शकों से मिलती-जुलती कोई बात हो तो और मदद मिलती है। विजुअल मीडियम की यही ताकत है। भारत के मुख्‍यधारा के फिल्‍मकार हमेशा इसके प्रति सजग रह

MOVIE REVIEW: GIPPI

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यदि आप किसी जुझारू डेंटिस्‍ट की तरह करण जौहर की फिल्‍म 'स्‍टूडेंट ऑफ द ईयर' के स्क्रिप्‍ट रीडिंग सेशन में बैठते और उसकी कहानी में मौजूद सभी कैविटीज को भरने की ठान लेते, उसमें थोड़ा-सा तर्क, हकीकत और मुलायमियत जोड़ देते और उस पर चढ़ा हुआ चमकदार मुलम्‍मा साफ कर देते, तो शायद जो नतीजा रहता, वह इस फिल्‍म जैसा ही होता।मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं, क्‍योंकि चंद माह के अंतराल में रिलीज़ हुई इन दोनों फिल्‍मों के निर्माता और प्रदर्शनकर्ता जौहर ही हैं और ये दोनों फिल्‍में इंट्रा-स्‍कूल ड्रामा की तरह हैं। ये फिल्‍में बच्‍चों की उम्र के उस असुरक्षा भरे दौर के बारे में हैं, जब उनके लिए अपने बारे में अपने दोस्‍तों की राय बहुत मायने रखती है और इसी के चलते वे आपसी प्रतिस्‍पर्द्धाओं में शरीक हो जाते हैं।लेकिन यह फिल्‍म अपनी

MOVIE REVIEW: ‘THE GREAT GATSBY’

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यह तुलना अजीब लग सकती है कि लेकिन द ग्रेट गेट्सबी अमेरिका के लिए वही है, जो भारतीयों के लिए देवदास है : दोनों साहित्यिक क्‍लासिक कृतियां हैं, जिनकी पृष्‍ठभूमि 20वीं सदी का पूर्वार्द्ध है।यह वह दौर था, जब सभी सामाजिक संबंधों पर वर्गभेद हावी रहता था और जहां पुरुष का भाग्‍य पूरी तरह से उस महिला के हाथों में होता था, जिसे उसने अपनी प्रेमिका के रूप में चुना है। वास्‍तव में ये दोनों ही सतही किताबें हैं और शायद यही कारण है कि उन पर बनाई गई फिल्‍में दर्शकों को बांधे रखती हैं।शरत चंद्र चट्टोपाध्‍याय की देवदास पर भारतीय सिनेमा में कम से कम 14 फिल्‍में बनाई जा चुकी हैं। वहीं एफ स्‍कॉट फिट्जगेराल्‍ड की द ग्रेट गेट्सबी पर भी यह पांचवीं फिल्‍म है। वर्ष 2002 में संजय लीला भंसाली ने देवदास का खासा भव्‍य संस्‍करण बनाया था। मॉलिन रॉउग, रोमि

MOVIE REVIEW: AURANGZEB

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यह फिल्‍म एक बड़े भारतीय संयुक्‍त परिवार की पृष्‍ठभूमि पर आधारित है। मां ममता की मूरत हैं और पिताजी सख्‍त हैं। वे अमूमन समाज के दबावों तले दबे रहते हैं। एक मौके पर हमें एक करवा चौथ दृश्‍य भी देखने को मिलता है। आखिर यह एक ‘यशराज फिल्‍म’ जो है। लेकिन दर्शकों को सचेत रहना चाहिए, क्‍योंकि यह फिल्‍म खासतौर पर उन लोगों के लिए बनाई गई है, जो यशराज फिल्‍म्‍स के प्रशंसक नहीं हैं।फिल्‍म की दृश्‍य-योजना अपने अंधेरेपन के चलते चौंकाती है। फिल्‍म के मुख्‍य किरदारों के इरादे भी इसी तरह अंधेरे में दबे-छुपे रहते हैं। ब्‍लॉकबस्‍टर फिल्‍में भावनाओं को प्रदर्शित करने के लिए बैकग्राउंड म्‍यूजिक का खूब इस्‍तेमाल करती हैं, लेकिन इस फिल्‍म में हमें संवादों के दौरान लंबे खामोश सीक्‍वेंस ही सुनने को म

MOVIE REVIEW: YE JAWANI HAI DIWANI

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फिल्‍म का पहला घंटा पूरे होते-होते हमें पूरा यकीन हो जाता है कि यह वर्ष 1995 की फिल्‍म दिलवाले दुल्‍हनियां ले जाएंगे की रीमेक है। लेकिन यहां मैंने रीमेक शब्‍द का उपयोग उस फिल्‍म की एक घटिया नकल के अर्थों में नहीं, बल्कि उसे नए मायने देने वाली फिल्‍म के रूप में किया है। सच पूछें तो हर बेहतरीन रीमेक ऐसी ही होती है।फिल्‍म का नायक एक बेपरवाह, शरारती नौजवान है। नायिका (दीपिका पादुकोण, जिनकी मुस्‍कराहट लाजवाब है) एक चश्‍मीश पढ़ाकू लड़की है, जो पहली बार अपने माता-पिता के बिना छुटि्टयां मनाने जा रही है। दोनों की कॉलेज की पढ़ाई हाल ही में पूरी हुई है। इस उम्र में लिए जाने वाले फैसले हमारी पूरी जिंदगी की दिशा तय कर सकते हैं। वे मनाली की वादियों में हैं। तभी दोनों के बीच कुछ-कुछ हो जाता है। दोनों ही समझ नहीं पाते कि हुआ क्‍या है। शायद इसकी व

MOVEI REVIEW : Yamla Pagla Deeewana 2

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जब हमारी नजरों के सामने स्‍क्रीन पर कोई फिल्‍म ही न हो तो हम किस बात की समीक्षा करें? वास्‍तव में तब तो ढेरों बातें की जा सकती हैं। आखिर हमने जो कुछ देखा है, उसके बारे में कोई तुक भिड़ाना ही तो सबसे गंभीर जिम्‍मेदारी होती है। इस तरह की हो-हल्‍ले वाली जलसानुमा फिल्‍म को देखने जाने से पहले यदि हम एक पटियाला पेग चढ़ाकर तनिक गाफिल हो जाएं तो यह हमारे लिए बेहतर रहेगा। लेकिन यदि शो सुबह का है तो पटियाला पेग चढ़ाना जल्‍दबाजी साबित होगी। मैं फिल्‍म के सुबह साढ़े नौ बजे वाला शो में बैठा हूं और यहां कौवे बोल रहे हैं। जाहिर है धरम पाजी और सनी पाजी के ज्‍यादा भक्‍त फिल्‍म देखने नहीं पधारे हैं।मैं आंखें मसल-मसलकर यह समझने की कोशिश करता हूं कि जब फिल्‍म में कोई विलेन ही नहीं है तो इतनी एक्‍शन काहे को हो रही है। मुझे एक शख्‍स (अन